आइए हाथ उठाएं हम भी

Name: लाल्टू
Location: हैदराबाद, आंध्र प्रदेश, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Tuesday, November 17, 2009

वहीं रख आया मन

उन्हीं इलाकों से वापस मुड़ना है
वहीं से गुजरते हुए
देखना है वही पेड़, वही गुफाएँ

* *

आँखें बूढ़ी हुईं
पेट बूढ़ा हुआ
रह गया अभागा मन
तलाशता वहीं जीवन

* *

चार दिनों में कोई लिखता
हरे मटर की कविता
मैं बार बार ढूँढता शब्द
देखता हर बार छवि तुम्हारी

* *

उन गुजरते पड़ावों पर
अब सवारी नहीं रुकती
बहुत दूर आ चुका हूँ
वहीं रख आया मन
वही ढूँढता चाहता मगन।

Friday, November 13, 2009

मेमेंटो बाँटो, फोटू खिंचवाओ

परसों एक स्थानीय राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में सईद आलम लिखित, निर्देशित और टाम आल्टर अभिनीत मौलाना आज़ाद पर मोनोलाग देखने गया था। टाम आल्टर पद्मश्री से सम्मानित कलाकार है। आम तौर से सरकारी किस्म के कार्यक्रमों में ऐसे सम्मानित व्यक्तियों का औपचारिक आदर औरों की तुलना में अधिक होता है। पर मैंने इतने बदतमीज़ दर्शक बहुत कम देखे हैं। टाम ने खुद अभिनय के दौरान गुस्सा दिखलाया और बाद में सईद आलम ने भी नाराज़गी व्यक्त की। बार बार सेल फ़ोन बजना, लगातार लोगों का स्टेज के साथ लगे दरवाजों से आना जाना। स्वयं वायस चांसलर या ऐसे ही किसी अधिकारी का पहले रो में बैठकर दफ्तरी कागज़ात देखना और कर्मचारी से बात करना, पता नहीं इन लोगों ने कार्यक्रम रखा क्यों था। हिंदुस्तान में कलाकारों का ऐसा अनुभव आम बात है। लोग नाटक देखने या संगीत का कार्यक्रम देखने नहीं जाते, मेला समझ कर जाते हैं। वक्त पर नहीं आएँगे, सेलफ़ोन पर फूहड़ बाजे वाली रिंग सुनेंगे, साथ दूध पीते या उससे थोड़े बड़े बच्चों को लाएँगे कि चल बच्चू देख नौटंकी देख।

कलाओं के प्रति पढ़े लिखे लोगों में ऐसा संकीर्ण और असभ्य रवैया क्यों है? पुराने मित्र हँस कर कहेंगे कि यह एशियटिक मोड आफ प्रोडक्सन से उपजे मूल्य हैं। उस दिन भी बाद में यह बहाना दिया गया कि बच्चे नासमझ हैं, जब कि जैसा सईद आलम ने कहा कि बच्चों पर इल्ज़ाम लगा के बड़े बरी नहीं हो सकते। पहले रो में बैठकर बंदा सेल फ़ोन बजा रहा है, इसके लिए कौन सा बच्चा दोषी है। सच यह है कि देश भर में निहायत असभ्य किस्म के कई लोग ऊँचे पदों पर आसीन हैं। इन्हें कला और शिक्षा के स्तर से कुछ लेना देना नहीं। कार्यक्रम हो गया, मेमेंटो बाँटो, फोटू खिंचवाओ, गाड़ी में बैठकर सौ गज दूर जाकर घर पर उतरो।

Tuesday, November 03, 2009

अधूरे चिट्ठे

अक्सर मैं चिट्ठा लिखने की सोचते ही रहता हूँ। पूरा नहीं कर पाता। यह कोई महीने भर पहले लिखा था। अधूरा ही रह गया:


द हिंदू में तनवीर अहमद का अपनी नानी के भाई बहन के साथ मिलन पर मार्मिक आलेख पढ़ा। ऐसी न जाने कितनी कहानियाँ पढ़ते सुनते रहे हैं, कितनी कितनी बार मन दहाड़ें मार कर रोने को होता है, पर दुनिया जैसी है, वैसी है और हम अवसाद के बवंडर में अगले दिनों की ओर चलते रहते हैं। तनवीर ने कहा है कि हालांकि काश्मीर के लोग अब एक साथ होने को तैयार हैं, पर पंजाब के लोग अभी भी ऐसा नहीं होने देंगे। इससे मुझे एक तो जरा असहमति है, साथ ही कई पुरानी बातें याद आ गईं।

पोखरन-कहूटा परमाणु विस्फोट और कारगिल युद्ध के बाद हम लोगों ने चंडीगढ़ में साइंस ऐंड टेक्नोलोजी अवेयरनेस ग्रुप के नाम से हिरोशिमा नागासाकी पर तैयार किया एक स्लाइड शो दिखाना शुरु किया था। इसका प्रत्यक्ष उद्देश्य नाभिकीय युद्ध से होने वाले ध्वंस के बारे में लोगों को जागरुक करना था। पर इस मुहिम में शामिल हर कोई जानता था कि बी जे पी सरकार के शुरुआती दिनों में के पाकिस्तान के प्रति नफरत फैलाना सांप्रदायिक ताकतों के एजेंडे में था और हम इसके खिलाफ काम कर रहे थे। अब याद नहीं कितने स्कूलों में, कितने सामुदायिक केंद्रों में हमने वह स्लाइड शो दिखाया। प्रसिद्ध लोक नाटककार भ्रा गुरशरण सिंह जी ने शो के स्क्रिप्ट के आधार पर एक नाटक तैयार किया और वह भी चंडीगढ के सेक्टर १७ पलाजा से लेकर पंजाब के कई गाँवों में दर्जनों बार खेला गया। मैं दर्जनों अतिशयोक्ति में नहीं लिख रहा हूँ। मुझे कई बार यह सोचकर तकलीफ होती है कि हमारे मुल्क में जनांदोलनों की गतिविधियों के दस्तावेज तैयार नहीं किए जाते और कितने लोगों की अकथ्य मेहनत इतिहास के पन्नों में गुम हो जाती है। बहरहाल हम तो एक बहुत बड़े सांप्रदायिकता और युद्ध विरोधी आंदोलन का एक छोटा हिस्सा मात्र थे, जो सन् २००० तक शिखर पर पहुँचने लगा था। धीरे धीरे मुख्यधारा के राजनैतिक दलों को यह समझ में आने लगा था कि आम पंजाबी यह नहीं चाहते कि सरहद के दोनों ओर लोगों में कोई वैमनस्य रहे। विश्व स्तर पर इधर के और उधर के पंजाबियों में सांस्कृतिक स्तर पर मेलजोल के प्रयास होने लगे थे। पर यह एक उफान की तरह उमड़ कर आएगा, ऐसी कल्पना शायद किसी ने तब भी न की थी। १९९९ में मैं पंजाब विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का सचिव बना। चंडीगढ़ का पंजाब विश्वविद्यालय डेढ़ सौ साल पुराने लाहौर के पुराने पंजाब विश्वविद्यालय का ही हिस्सा माना जाता है, हालांकि लाहौर वाले ऐसा नहीं मानते हैं। दोनों के अंग्रेज़ी नामों में जरा सा फर्क है। चंडीगढ़ की यूनिवर्सिटी के नाम में पंजाब को Panjab लिखा जाता है, जबकि लाहौर में Punjab। बहरहाल मैंने इस खयाल का फायदा उठाते हुए प्रयास शुरु किए कि लाहौर के पंजाब विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ के साथ संगठन के स्तर पर संपर्क किया जाए। मैंने लाहौर कैंपस के कुलाधिपति, जो कोई सैन्य अधिकारी था, से संपर्क करने की कोशिश की। और मैं पूरी तरह असफल रहा। अध्यापक संघ के दूसरे पदाधिकारी मेरे कैंपस से बाहर की गतिविधियों से बहुत ज्यादा वास्ता तो न रखते थे, पर उनका कोई विरोध भी न था। साथ ही अध्यक्ष प्रोफेसर पी पी आर्य ने पूरी छूट दी हुई थी कि मैं तरक्कीपसंद खयालों के मुताबिक कुछ भी करुँ तो वह मेरे साथ थे। खैर वह साल बीत गया और मैं संगठन के पद का अपने इस उद्देश्य के लिए फायदा न उठा पाया। पर इसी बीच मैं और दोस्तों से बातचीत करता रहा और किसी तरह परवेज हुदभाई से संपर्क हुआ। परवेज पाकिस्तान का विश्व स्तर पर प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक शास्त्री है और साथ ही शांति आंदोलन में बहुत बड़ा नाम भी है। भारत के जन विज्ञान आंदोलन की ओर से परवेज को कलिंग पुरस्कार दिया जाना था, पर भारत और पाकिस्तान दोनों सरकारें इस में अड़चन बनी हुईं थीं। अब याद नहीं कि किस स्टेज पर परवेज ने लिखा कि वह तो आ नहीं सकता (बाद में २००५ में परवेज आया था और उसे तीन साल बाद वह पुरस्कार दिया गया), पर लाहौर यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट साइंसेस (LUMS) के सरमद अब्बासी को कहा जाए तो शायद सरकारों को उसके हिंदुस्तान आने पर आपत्ति न होगी। इसी बीच चंडीगढ तो नहीं पर दिल्ली से कई सक्रिय साथी शांति यात्राओं में सक्रिय हो रहे थे और दिल्ली विश्वविद्यालय से एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों के साथ पाकिस्तान घूम आया था। तो मैंने सरमद से संपर्क किया। २००३ में शिक्षक संगठन का अध्यक्ष चुना गया और तुरंत मैंने सरमद अब्बासी को चंडीगढ़ लाने की तैयारी शुरु की। आखिर सरमद और लम्स के छः विद्यार्थी चंडीगढ़ पहुँचे।
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इसके बाद लिख नहीं पाया, जबकि इसके बाद की बहुत सारी बातें हैं जिन्हें लिखा जाना चाहिए। हो सकता है कोई और दोस्त जो इस प्रकिया में शामिल थे, इस पर लिखें।
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पिछले हफ्ते एक और चिट्ठा लिखना शुरु किया था - वह तो दो लाइनों से आगे भी नहीं पहुँचा। वह भी द हिंदू की ही एक खबर पर था जिसमें लिखा था कि छत्तीसगढ़ में पुलिस वालों या सलवा जुडुम वालों ने एक आदिवासी बच्चे की उँगलियाँ काट दी हैं ताकि उसके माँ बाप माओवादियों के बारे में सूचना दें। बेचारे माँ बाप डर के मारे कुछ बतलाना नहीं चाहते और मारे मारे भाग रहे हैं कि कहीं फिर कोई उन पर हमला न कर बैठे। ऐसी खबरों को पढ़ कर आश्चर्य होना चाहिए, पर होता नहीं है। सम्पन्न वर्गों की क्रूर उदासीनता में जी रहे हम लोग इस बात से बेखबर से हैं कि सरकार ने जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। गृह मंत्री इसे युद्ध कहना नहीं चाहता, क्योंकि यह ऐसा युद्ध है, जिसमें सभी मानव अधिकारों को तिलांजलि दे दी गई है। अब नागरिक अधिकार संस्थाओं की रीपोर्ट आई है, जिसमें खनिज खुदाई और व्यापार से जुड़े पूँजी मालिकों के हित में सरकार द्वारा छेड़े इस युद्ध की सच्चाई का पूरा ब्यौरा है। मध्यवर्ग के लोगों को नागरिक अधिकार या मानव अधिकार जैसे शब्दों से एलर्जी होती है, क्योंकि अपनी सच्चाइयों से रुबरु होने में हमें तकलीफ होती है। इसलिए भाइयो, इंडिया टूडे में आकाश बनर्जी का यह पोस्ट पढ़ लो। इसकी कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ -

First Question- Will 'Operation Green Hunt' be successful?
Honestly the answer is a big NO. Call me a Naxal sympathizer, but like me, if you ever face the brutal wrath of the local police in heartland India - your world view will witness a paradigm shift within seconds. I was in West Bengal last July - covering the offensive launched by the state administration to counter the Naxals in Lalgarh. It was here, during one of the shoots that my cameraperson and I were chased down a road in Midnapore district by the West Bengal police and hit with sticks.

Our crime??? We had dared to shoot the police breaking down doors and hauling up village youngsters for 'questioning'. (What happens in these 'questionings' I don't need to tell you) When journalists could be treated like dogs by the police - I began to grasp the plight of the local villagers who don't have a voice - or redressal system of any sort. The moral of the story is very simple - between the two evils of Naxalism and Police, the tribals choose the former. At least Naxals don't rape, maim and kill without reason.

वैसे यह तो बहुत बड़ा आश्चर्य है ही कि सूचना-क्रांति के इस युग में निरंतर अन्यायों व अत्याचारों से भरपूर हमारे जैसे समाज आज भी टिके हुए हैं। पर इतिहास यही बतलाता है कि बड़ी सी बड़ी भी दमनकारी ताकतें भी विरोध को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर पातीं और इंसान है ही ऐसा जंतु कि बार बार विद्रोह के लिए उठ खड़ा होता है।
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एक मित्र ने जेम्स ब्राइडल के A New THEORY of
AWESOMENESS and MIRACLES शीर्षक एक रोचक व्याख्यान पर यह लिंक पोस्ट किया है।

Monday, October 12, 2009

एक कहानी कुछ विचार

मैं इन दिनों 'रीडिंग्स फ्राम हिंदी लिटरेचर' नामक कोर्स पढ़ा रहा हूँ। 'हंस' पत्रिका के युवा लेखन पर आधारित अगस्त अंक में प्रकाशित दो कहानियाँ पढ़ी गईं। इन पर विषद् चर्चा हुई। एक छात्र (शशांक साहनी) द्वारा संयोजित कुछ टिप्पणियाँ नीचे हैं। दूसरी कहानी (तबस्सुम फातिमा की 'हिजाब') मुझे ज्यादा बेहतर लगी थी, उस पर कम चर्चा हुई, और शशांक को शायद कोई भी टिप्पणी याद नहीं रही। शायद बाकी छात्र इस ब्लाग पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए दूसरी कहानी पर भी कुछ लिखें।


बकौल शशांकः
हमने हिंदी की कक्षा में हंस पत्रिका में प्रकाशित एक कहानी " प्रार्थना के बाहर " (गीताश्री) पर चर्चा की । हमारे साथ हैदराबाद विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग के शोध छात्र राजीव भी थे । उन्होने सभी छात्रों से इस कहानी के बारे में अपने-अपने विचार पूछे तो सभी ने कई अलग अलग विचार प्रस्तुत किये । उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -
-> प्रार्थना इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद ऐसी गलतियाँ कैसे कर सकती थी ?
-> पिछले विचार पर ये बात उठी की हम किन चीजों को गलत मानते हैं ? समाज में जो सही कहा जाता है क्या हम उसे ही सही मानेंगे ?
-> प्रार्थना जो कुछ भी करती थी वो उसकी मर्ज़ी थी वो किसी का बुरा तो नहीं करती थी तो हम उसे गलत क्यों कहते हैं ?
-> कई लोगो के मन में ये विचार थे की क्या रचना जैसे ईमानदार लोगों को सफलता नहीं मिलती और प्रार्थना जैसे अपनी मर्ज़ी से जीने वाले लोग सफल हो जाते हैं ?
-> चर्चा की शुरुआत में सबको लगा था कि प्रार्थना लोगों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बावजूद भी पढ़कर अच्छा रैंक ले आई परन्तु तब राजीव ने कहानी कि कुछ पंक्तियाँ वापिस पढ़कर बताया जिनसे साफ़ पता चलता था कि वो परिणाम उसके दिल्ली आने से पहले की मेहनत से आया था | तो इससे ये बात तो सबको साफ़ हो गई थी कि कहानी कहीं से भी प्रार्थना के विचारों को प्रगतिशील नहीं कहती है ।
-> सभी इसी मत में थे कि प्रार्थना के विचार एक आधुनिक महिला के ख्याल थे और पुरुष प्रधान समाज को चुनौती देते थे ।
-> और तब राजीव ने इस बात की तरफ इशारा किया कि वो वही सब कर रही ही जो पुरुष करते हैं तो एक तरह से वो पुरुष प्रधान समाज के ही नक्शे कदम पर चल रही थी । अगर उसे इस पुरुष प्रधान समाज से लड़ना था तो उसे पुरुष बन कर नहीं बल्कि स्त्री बन कर लड़ना चाहिए ।
-> फिर राजीव ने कहानी के दूसरे पहलू पर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि प्रार्थना की रूममेट रचना को एक आम भारतीय नारी की तरह दर्शाया गया है । उसके जीवन की परेशानियाँ एक आम भारतीय नारी जैसी होती हैं ।

सोचना यह है कि हम आज कहाँ हैं।

लंबे समय से दिमाग में बातें चलती रहीं कि ब्लाग में डालना है। 'द हिंदू' में तनवीर अहमद का अपनी नानी को उनके भाई बहन से मिलवाने पर यह मार्मिक लेख पढ़ कर थोड़ा सा लिखा भी, फिर छूट गया। लेख पढ़ कर अपने और साथियों के कुछ प्रयासों की याद आ गई, जो सीमा के दोनों ओर के आम लोगों के बीच संबंध स्थापित करने की दिशा में थे। वह फिर कभी पूरा लिखा जाएगा। फिर हाल में दो खबरें ज्यादा ध्यान खींच गईं - एक तो human development index (मानव विकास सूची) में भारत और पाकिस्तान का क्रमशः १३४वें और १४१वें स्थान पर होना, और इस खबर के दूसरे ही दिन भारतीय मूल के वैज्ञानिक को रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा होनी।

इसके कुछ ही दिन बाद संस्थान में आए एक वक्ता द्वारा मानव के पूर्णता की ओर जाने बातचीत करते हुए यह कहना कि दो सौ साल पहले विश्व स्तर पर घरेलू सकल उत्पाद में भारत का हिस्सा २६% था (वक्ता ने कहा कि चीन का हिस्सा इससे कम था) और आज वह 0.८६% है, यह सब बातें दिमाग में चल रही थीं। आँकड़ें सही होंगे; अक्सर इस तरह की बातें ऐसे कही जाती है कि सोचो कभी सोचा था तुमने? सोचने पर दरअस्ल बात इतनी बड़ी निकलती नहीं जितनी बनाई गई होती है। आखिर औद्योगिक क्रांति के पहले पश्चिमी मुल्कों में लोग काफी फटेहाल थे, यह कौन सी नई बात है। पर हम आज की तुलना में अधिक समृद्ध नहीं थे, हम तब उनकी तुलना में कम फटेहाल थे। राजा महाराजाओं के पास लूट का माल यहाँ भी था, वहाँ भी था। आम लोग वहाँ के बनिस्बत यहाँ कम कुदरत के मारे थे।

मानव विकास सूची में चीन अब ७१वें स्थान पर है। सोचना यह है कि हम आज कहाँ हैं।

Wednesday, September 16, 2009

टिप्पणी का सिलसिला

कोई नई बात नहीं
एक और आलेख
एक और लिंक
http://www.timesonline.co.uk/tol/news/world/asia/article6837585.ece

कोई अदम गोंडवी लिखे फिर एक गीत
'सौ में सत्तर आदमी जब भूख से नाशाद हो
दिल पे रख कर हाथ कहिए
देश क्या आज़ाद है...'
दोस्तो, मेरे पिछले एक चिट्ठे पर किसी अंजान भाई की एक टिप्पणी आई ।
निरपेक्षता का आग्रह है। मैंने एक जवाबी टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि प्रेषक की टिप्पणी न केवल प्रासंगिक नहीं, बल्कि उसके अपने पूर्वाग्रहों की ओर संकेत करती है। ऊपर Times की लिंक उसी सिलसिले में है।

परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए

Margaret Atwood की कविता बेटी के ब्लॉग से और मेरा अनुवादः

We are hard on each other -- Margaret Atwood
परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए - मार्ग्रेट ऐटवुड

i)

परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए
हम अपनी बातों को साफगोई कहते हैं
अपने पैने सच
सावधानी से चुन फेंकते हैं
निरपेक्ष मेज पार।

जो बातें हम कहते हैं, वह सच हैं
हमारे निशानों में ही होतीं तिकड़में
जिससे वे खूँखार बन जाते हैं।

ii)


सच है कि तुम्हारे झूठ
ज्यादा खुशगवार हैं
हर बार नये जो ढूँढ लाते हो

तकलीफदेह और ऊबाऊ तुम्हारे सच
बार बार कहे जाते हैं
शायद इसलिए कि उनमें से बहुत कम हैं
जिन्हें तुम मानते हो कि तुम्हारे हैं

iii)

सच ज़िंदा तो है
पर इसका ऐसा इस्तेमाल
गलत है। मुझे प्यार है तुमसे

यह सच है या औजार?

iv)


इस तरह हिलते डुलते
क्या शरीर झूठ बोलता है
ये स्पर्श, केश, यह गीला नर्म संगमरमर
जिसपर मेरी जीभ दौड़ती है
क्या ये झूठ हैं जिन्हें तुम कह रहे हो?

तुम्हारा शरीर कोई शब्द नहीं
यह झूठ नहीं कहता
सच भी नहीं कहता

बस मौजूद है यहाँ
या मौजूद नहीं है।


We are hard on each other -- Margaret Atwood


i)

We are hard on each other
and call it honesty,
choosing our jagged truths
with care and aiming them across
the neutral table.

The things we say are
true; it is our crooked
aims, our choices
turn them criminal.

ii)

Of course your lies
are more amusing:
you make them new each time.

Your truths, painful and boring
repeat themselves over & over
perhaps because you own
so few of them

iii)

A truth should exist,
it should not be used
like this. If I love you

is that a fact or a weapon?

iv)

Does the body lie
moving like this, are these
touches, hairs, wet
soft marble my tongue runs over
lies you are telling me?

Your body is not a word,
it does not lie or
speak truth either.

It is only
here or not here.


© Margaret Atwood

Friday, September 11, 2009

हर कोई

सुबह निकलता हूँ। रात होने पर घर लौटता हूँ। जैसे हर कोई।


हर कोई

हर किसी की ज़िंदगी में आता है ऐसा वक्त
उठते ही एक सुबह
पिछले कई महीनों की प्रबल आशंका
संभावनाओं के सभी हिसाब किताब
गड्डमड्ड कर
साल की सबसे सर्द भोर जैसी
दरवाजे पर खड़ी होती है

हर कोई जानता है
ऐसा हमेशा से तय था फिर भी
कल तक उसकी संभावनाओं के बारे में
सोचते रह सकने का हर कोई
शुक्रिया अदा करता है
उस अनिश्चितता का जो
बिना किसी सैद्धांतिक बयान के
होती चिरंतन

हर कोई
होता है तैयार
सड़क पर निकलते ही
'ओफ्फो! बहुत गलत हुआ' सुनने को
या होता विक्षिप्त उछालता इधर उधर पड़े पत्थरों को
या अकेले में बैठ चाह सकता है
किसी की गोद में
आँखें छिपा फफक फफक कर रोना

हर कोई गुजरता है इस वक्त से
अपनी तरह और कभी
डूबते सूरज के साथ
लौटा देता है वक्त उसी
समुद्र को

फेंका जिसने इसे पुच्छल तारे सा
हर किसी के जीवन में।
(१९९४; इतवारी पत्रिका-१९९७)

Tuesday, September 08, 2009

हम लोग सुनते रहते हैं

आखिरकार जो किसी भी स्वस्थ दिमाग के आदमी को अरसे पता था, वही सच सामने आया


इशरत तो अब है नहीं, जैसे नीलोफर जान और आशिया जान नहीं हैं। जैसे न जाने कितने कितने निर्दोष गायब हो गए हैं, सिर्फ इसलिए कि बीमार दिमागों की भीड़ उन्हें पुलिस और फौज की वर्दियों में या कभी बस सादे लिबासों में आ खा गई। एक बार अपनी लिखी कविताओं को पढ़ता हूँ और दो पल रो लेता हूँ।

हिंदू में आज प्रोफेसर पनिक्कर का एक आलेख भी है। इसका मूल वक्तव्य हैः जबतक सार्वजनिक क्षेत्र के धर्म निरपेक्ष स्वरुप की पुनर्प्रतिष्ठा नहीं होती, जो धार्मिक स्वरुप इसने अख्तियार किया है, वह राज्य के कार्यों पर हावी होता रहेगा। (Unless the secular character of the public sphere is retrieved, the religious character that it has come to have could impinge on the functions of the state.

पिछले दिनों मीरा नंदा हमारे यहाँ आई थी। उसने अपनी पुस्तक 'The God Market' पर भाषण देना था, जिसमें पिछले दशकों में वैश्वीकरण और उदारीकरण की सरकारी नीतियों के साथ मध्य वर्ग में बढ़ रही मजहबपरस्ती पर अपने शोधकार्य पर उसने कहना था। कुछ लोगों ने कोशिश की कि यह भाषण होना नहीं चाहिए। आखिर हुआ भी तो बहुत कम लोग सुनने आए। जो आए उनका खयाल था कि संविधान बनाने वालों को जनमानस की सुध न थी। एक दोस्त कह गया कि निजी क्षेत्र में धर्म का मकसद कल्याणकारी है। देखना यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र में भी ऐसा हो। यानी इसलिए अगर सरकारी नीतियों से धार्मिक संस्थानों को ज़मीनें और अनुदान मिल रहे हैं तो चिंता की बात नहीं। पढ़े लिखे समझदार लोग इस तरह का बकवास करते रहते हैं, हम लोग सुनते रहते हैं। कुछ दो एक हमारे जैसे मित्र थे जिनको मीरा की चिंताएँ ठीक लगीं।